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सिख धर्म की शुरुआत गुरु नानक देव जी के द्वारा की गई थी जिनका जन्म 1469 में पाकिस्तान के तलवंडी में हुआ था। इस प्रकार सिख धर्म में 1469 से 1708 तक 10 सिख गुरुओं का इतिहास रहा है। अंतिम सिख गुरु गुरु गोविंद सिंह की मृत्यु 1708 में महाराष्ट्र के नांदेड़ा में हुई थी जिनका जन्म पटना में हुआ था। गुरु गोविंद सिंह ने मरने से पहले बंदा बहादुर को अपना उत्तराधिकारी चुना जो सिखों का पहला राजा बना। इस प्रकार 1708 से 1848 तक 6 सिख राजाओं ने पंजाब रियासत पर शासन किया। इनमें सिखों के सबसे महान शासक महाराजा रणजीत सिंह थे। जिन की प्रशासनिक राजधानी लाहौर थी तथा धार्मिक राजधानी अमृतसर थी। यही अफगान शासक शाहशूजा से कोहिनूर हीरा भारत वापस लाये थे। महाराजा रणजीत सिंह ने सतलज नदी के उत्तर में लाभकारी क्षेत्रों पर अपना मजबूत नियंत्रण बनाए रखने के लिए 1809 में अंग्रेजों से अमृतसर की संधि की। सिख साम्राज्य के अंतिम शासक दिलीप सिंह थे जो नाबालिग थे। इन्हीं के समय में प्रथम तथा द्वितीय आंग्ल-सिख युद्ध हुआ था। प्रथम आंग्ल-सिख युद्ध 1845 से 1846 तक चला जो लाहौर की संधि तथा भैरोवाल की संधि के साथ समाप्त हो गया, जिसमें दिलीप सिंह के वयस्क होने तक लाहौर पर अंग्रेजी अधिकार रहने की शर्तें मंजूर हुई थी। लेकिन बाद में लाहौर के गवर्नर मूलराज से अंग्रेजों ने 20 लाख रुपए की मांग की, जिस कारण मूलराज ने गवर्नर पद से इस्तीफा दे दिया और विद्रोह कर दिया। यहीं से दूसरे आंग्ल-सिख युद्ध की शुरुआत हो गई। जो 1849 में चिलियांवाला का युद्ध तथा गुजरात के युद्ध के साथ समाप्त हुआ। और गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी ने पंजाब रियासत को ईस्ट इंडिया कंपनी में शामिल कर लिया। और महाराजा दिलीप सिंह को शिक्षा के लिए लंदन भेज दिया गया। जिनसे ईस्ट इंडिया कंपनी ने कोहिनूर हीरा छीन लिया जिसके बाद में तीन टुकड़े कर दिये गये जिसमें 2 टुकड़े महारानी एलिज़ाबेथ के मुकुट में हैं और एक टुकड़ा लंदन के अजायब घर में रखा है।